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दिशाओं के देवता एवं ग्रह । आचार्य चन्दन धर द्विवेदी

१- पूर्व दिशा के देवता:-  इन्द्र हैं।२- पश्चिम दिशा के देवता :- वरुण हैं। ३- उत्तर दिशा के देवता :- कुबेर हैं। ४- दक्षिण दिशा के देवता:-  यमराज हैं। ५- ईशान कोण के देवता:-  शंकर हैं।  ६- आग्नेय कोण के देवता :- अग्निदेव हैं।   ७- वायव्य कोण के देवता:-  वायुदेव हैं। ८-नैऋत्य कोण के देवता :- निऋर्ति (राक्षस) हैं। १- पुर्व दिशा के ग्रह :- सूर्य है। २- पश्चिम दिशा के ग्रह :- शनि है। ३- उत्तर दिशा के ग्रह :- बुध है। ४- दक्षिण दिशा के ग्रह :- मंगल है। ५- ईशान कोण के ग्रह:-  बृहस्पति है। ६- वायव्य कोण के ग्रह :- चन्द्रमा है। ७- अग्नि कोण के ग्रह :- शुक्र है। ८- नैऋत्य कोण के ग्रह :- राहु और केतु है। प्रमाणिक ग्रंथ :- भवन भास्कर


भूमि की सतह का वास्तु । आचार्य चन्दन धर द्विवेदी

१- पूर्व में ऊंची भूमि पुत्र और धन का नाश करने वाली होती है। २- आग्नेय में ऊंची भूमि धन देने वाली होती है। ३ - दक्षिण में ऊंची भूमि सब कामनाओं को पूर्ण करने वाली तथा नीरोग करने वाली होती है। ४ - नैऋत्य में ऊंची भूमि धनप्रदायक होती है। ५ - पश्चिम में ऊंची भूमि पुत्रप्रदायक तथ धन - धान्य की वृद्धि करने वाली होती है। ६ - वायव्य में ऊंची भूमि धनदायक होती है। ७-  उत्तर में ऊंची भूमि पुत्र और धन का नाश करने वाली होती है। ८ - ईशान में ऊंची भूमि महाक्लेशकारक देनी वाली होती है। ९ - पूर्व में नीची भूमि पुत्रदायक तथा धन की वृद्धि करने वाली होती है। १० - आग्नेय में नीची भूमि धन का नाश करने वाली, मृत्यु तथा शोक देने वाली और अग्नि भय देने वाली होती है।  प्रामाणिक ग्रंथ:-  भवनभास्कर

व्यापार का वास्तु । आचार्य चंदन धर द्विवेदी

१- दुकान, ऑफिस,फैक्ट्री आदि में मालिक हो पूर्व अथवा उत्तर की ओर मुंह करके बैठना चाहिए२- दुकान की वायव्य दिशा में रखा गया माल शीघ्र बिकता है। ३-फैक्ट्री में भी तैयार माल वायव्य दिशा में रखना चाहिए। ४-भारी मशीन आदि पश्चिम दक्षिण में रखनी चाहिए। ५- दुकान का मुख वायव्य दिशा में होने से बिक्री अच्छी होती है। ६- भारी समान नैऋत्य दिशा में रखना चाहिए। ७ - पूर्व उत्तर अथवा ईशान में भारी समान यथासंभव नहीं रखना चाहिए। प्रमाणिक ग्रंथ :- भवनभास्कर

तिथियों के स्वामी । आचार्य चंदन धर द्विवेदी

१- प्रतिपदा तिथि का स्वामी अग्नि हैं। २- द्वितीया तिथि का स्वामी ब्रह्मा हैं। ३- तृतीया तिथि के स्वामी गौरी हैं ४-चतुर्थी तिथि के स्वामी गणेश हैं। ५-पंचमी तिथि के स्वामी नाग है। ६- षष्ठी तिथि के स्वामी कार्तिकेय हैं। ७- सप्तमी तिथि के स्वामी सूर्य हैं। ८- अष्टमी तिथि के स्वामी शिव हैं। ९ - नवमी तिथि के स्वामी दुर्गा हैं। १०- दशमी तिथि के स्वामी यमराज हैं। ११- एकादशी तिथि के स्वामी विश्वदेव हैं। १२- द्वादशी तिथि के स्वामी भगवान विष्णु हैं। १३- त्रयोदशी तिथि के स्वामी कामदेव हैं। १४- चतुर्दशी तिथि के स्वामी शिव हैं। १५-  पूर्णिमा का स्वामी चंद्रमा हैं। ३०- अमावस्या के स्वामी की पितर हैं। प्रामाणिक ग्रन्थ :-  मुहूर्त चिंतामणि ।।

ग्रहों की दिशा । आचार्य चंदन धर द्विवेदी

१- पूर्व दिशा का स्वामी :- सूर्य ग्रह है। २- अग्नि कोण का स्वामी :-  शुक्र ग्रह है। ३- दक्षिण दिशा का स्वामी :- मंगल ग्रह है। ४- नैऋत्य कोण का स्वामी :- राहु एवं केतु ग्रह है। ५- पश्चिम दिशा का स्वामी :- शनि ग्रह है। ६- वायव्य कोण का स्वामी :- चंद्रमा ग्रह है। ७- उत्तर दिशा का स्वामी :- बुध ग्रह है। ८- ईशान कोण का स्वामी :- बृहस्पति ग्रह है।

ग्रहों की ऋतु । आचार्य चंदन धर द्विवेदी

१- ग्रीष्म ऋतु का स्वामी :- सूर्य मंगल तथा राहु ग्रह है। २- वर्षा ऋतु का स्वामी:-  चंद्रमा ग्रह है। ३- हेमंत ऋतु का स्वामी :- बृहस्पति ग्रह है। ४- बसंत ऋतु का स्वामी :- शुक्र ग्रह है। ५- शिशिर ऋतु का स्वामी :- शनि ग्रह है। ६- शरद ऋतु का स्वामी :- बुध ग्रह है।

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ग्रह मैत्री दोष का परिहार ‌। आचार्य चंदन धर द्विवेदी

१- राशियों के स्वामीयों या नवांशेशों की मैत्री या एकता हो। २- भकूट दोष ना हो ।

गण दोष का परिहार । आचार्य चंदन धर द्विवेदी

१- राशियों के स्वामीयों या नवांशेशों की मैत्री या एकता हो।
२- भकूट दोष ना हो।

वर्ण दोष परिहार । आचार्य चंदन धर द्विवेदी

राशियों के स्वामीयों या नवांशेशों की मैत्री या एकता हो।